Mayro Jamna Bai Ro

मायरो जमना बाई रो

●●भूमिका●●

परम तत्व को भौतिक नेत्रों से नहीं देखा जा सकता यह शाश्वत है। और जब कोई परमतत्व का कृपा पात्र मनुष्य पृथ्वी पर जन्म लेता है,अर्थात अवतार लेता है और जब जरा के माध्यम से वापस वह अपने यथा स्थान को चला जाता है ।उसके बाद मनुष्य रूप में उनका लौट कर आना और मानवीय रूप में व्यवहार करना सर्वदा असंभव है।क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि जो गर्भ से जन्म लेगा उसका अंत निश्चित है।

हमारे प्रभु श्याम में भी परम तत्व का प्रकाश है। अतएव वह अपने मूल रूप में कभी भी पृथ्वी पर पुनः आकर किसी भी भक्त से व्यवहारिक रूप में संबंध स्थापित करें यह असंभव है ।
अभिप्राय यह कि हमारे प्रभु श्याम निश्चित ही दयालु हैं और अपने भक्तों पर अन्यन्य प्रकार से कृपा करते हैं ।तथा उनकी मनोकामना भी पूर्ण करते हैं।

किंतु अपने मूल रूप में नहीं। देवता से जिस प्रकार का संबंध भक्त बनाता है देवता उसी संबंध को स्वीकार कर भक्तों के साथ में उसी तरह का व्यवहार करते हैं,बहू रूप में। ब्राह्मण की कन्या मीराबाई पर भी हमारे प्रभु श्याम इसी प्रकार कृपा करते हैं, कि जब मीराबाई ने प्रभु श्याम को अपने भाई के रूप में स्वीकार कर लिया तो बाबा श्याम भाई के प्रत्येक दायित्व का निर्वाह एक बंजारे के रूप में किया ।सामान्यतः सभी को वह बंजारा, बंजारा ही नजर आता था किंतु मीराबाई को उस बंजारे में हमेशा अपने बाबा श्याम की मूरत ही दिखाई देती थी । और उसकी मान्यता भी यही थी कि यह बंजारा नहीं है,यह मेरे प्रभु श्याम हैं जो मेरे भाई के रूप में आकर मेरे साथ में भाई के प्रत्येक दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं । यह उसकी मान्यता थी। क्योंकि बंजारों के लिए यह सर्वविदित है कि बंजारों का अपना कोई नगर नहीं होता उनका अपना कोई स्थान नहीं होता।
वह अपने गायों के साथ में यहां से वहां विचरण करते रहते हैं ।किंतु यह भी प्रमाणित है कि बंजारे जिनके साथ में जिस तरह का संबंध स्थापित कर लेते हैं उसका निर्वाह करते हैं ।इस तरह की बहुत सारी घटनाएं राजस्थान, गुजरात और हरियाणा में यत्र तत्र बिखरी पड़ी है ।

उसी श्रृंखला में यह किसना नाम का बंजारा मीराबाई के साथ में भाई का संबंध निर्वाह करता है। रक्षाबंधन की राखी,तीज का सिंधारा और मीराबाई की कन्या के विवाह में जोरदार मायरा लेकर आता है ।और धर्म के भाई के रूप में मीराबाई का वह मायरा भरता है जो एक स्मरणीय कथा बन जाती है। घटना क्रम इतने तेजी से घटित होते हैं कि दृष्ट्या का भरोसा डगमगाता है।परंतु पूर्ण आस्थावान मीरा बाई अडिग रहती है कि मेरे बड़े भाई श्याम आएंगे और निश्चित आएंगे। औऱ इसी भरोसे को प्राप्त होती है श्याम कृपा!!!

श्याम बाबा रो मायरोभी इसी श्रंखला की एक कथा है।
जिसमें भक्त(मीरा बाई) का समर्पण और विश्वाश ही बंजारे में श्याम तत्वपरिलक्षित होता है ।
जय जय बाबा श्याम…
….विश्वनाथ वशिष्ठ

जय श्री श्याम !!

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